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सिंधु जल संधि

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty - इंडस वॉटर ट्रीटी) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई एक जल-बंटवारा संधि है..

सिंधु जल संधि

Suraj
March 13, 2025

सिंधु जल संधि क्या है? इसका इतिहास और उद्देश्य क्या था?🔗

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सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty - इंडस वॉटर ट्रीटी) भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुई एक जल-बंटवारा संधि है। इस पर कराची में 19 सितंबर, 1960 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक (तत्कालीन 'पुनर्निर्माण और विकास हेतु अंतरराष्ट्रीय बैंक' - International Bank for Reconstruction and Development) ने इस संधि में मध्यस्थता की थी।

इतिहास (History):

1947 में भारत के विभाजन के समय, सिंधु नदी बेसिन (Indus River Basin) को दो भागों में बाँट दिया गया। पाकिस्तान को निचला हिस्सा मिला, जबकि भारत को ऊपरी हिस्सा। इसके अलावा, दो महत्वपूर्ण सिंचाई हेडवर्क्स (Irrigation Headworks) - रावी नदी पर माधोपुर और सतलुज नदी पर फिरोजपुर - जो पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण थे, भारत के क्षेत्र में आ गए। इससे दोनों देशों के बीच जल उपयोग को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ।

उद्देश्य (Objective):

सिंधु जल संधि का मुख्य उद्देश्य सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के जल का भारत और पाकिस्तान के बीच उचित और न्यायसंगत बंटवारा करना था, ताकि दोनों देशों की सिंचाई, बिजली उत्पादन और अन्य आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। इस संधि का एक और उद्देश्य यह भी था कि भविष्य में जल को लेकर दोनों देशों के बीच कोई विवाद न हो।

indus overview Overview and Background of the Indus Waters Treaty
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सिंधु जल संधि के मुख्य प्रावधान (Provisions) क्या हैं? नदियों का बंटवारा कैसे किया गया है?🔗

सिंधु जल संधि के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं:

  • नदियों का बंटवारा (Division of Rivers): सिंधु नदी प्रणाली (Indus River System) की छह नदियों को दो भागों में बांटा गया:

    • पूर्वी नदियाँ (Eastern Rivers): ब्यास (Beas), रावी (Ravi) और सतलुज (Sutlej) नदियों का नियंत्रण भारत को दिया गया। भारत इन नदियों के जल का उपयोग बिना किसी प्रतिबंध के कर सकता है।
    • पश्चिमी नदियाँ (Western Rivers): सिंधु (Indus), चिनाब (Chenab) और झेलम (Jhelum) नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को दिया गया। हालांकि, भारत को इन नदियों के जल का सीमित उपयोग करने की अनुमति दी गई है, जैसे कि:
      • गैर-उपभोग्य उपयोग (Non-Consumptive Use): जैसे कि नौकायन (navigation), मछली पालन (fish culture), और लकड़ी तैराना (floating of timber)।
      • घरेलू उपयोग (Domestic Use)
      • कृषि उपयोग (Agricultural Use): सीमित सिंचाई के लिए।
      • पनबिजली उत्पादन (Hydroelectric Power Generation): "रन-ऑफ-द-रिवर" (Run-of-the-River) परियोजनाओं के तहत, यानी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किए बिना।
  • स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission): संधि के तहत एक स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) की स्थापना की गई। इस आयोग में भारत और पाकिस्तान दोनों के आयुक्त (Commissioners) होते हैं। आयोग का कार्य संधि के कार्यान्वयन (implementation) की निगरानी करना और जल बंटवारे से संबंधित किसी भी विवाद को हल करना है। आयोग की बैठक वर्ष में कम-से-कम एक बार अवश्य आयोजित की जानी चाहिये तथा संधि के अनुसार, यह बैठक हर वर्ष बारी-बारी भारत और पाकिस्तान में आयोजित की जाएगी।

  • विवाद समाधान तंत्र (Dispute Resolution Mechanism): संधि में विवादों को हल करने के लिए एक त्रि-स्तरीय (three-tier) प्रणाली स्थापित की गई है:

    1. स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission): सबसे पहले, विवादों को आयोग के स्तर पर हल करने का प्रयास किया जाता है।
    2. तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert): यदि आयोग विवाद को हल करने में विफल रहता है, तो विश्व बैंक द्वारा एक तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) नियुक्त किया जा सकता है।
    3. मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration): यदि तटस्थ विशेषज्ञ भी विवाद को हल नहीं कर पाता है, तो मामला मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) को भेजा जा सकता है।

indus rivers rights River Division and RightsObligations
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भारत पश्चिमी नदियों पर किस प्रकार की परियोजनाएँ बना सकता है? क्या शर्तें हैं?🔗

सिंधु जल संधि के तहत, भारत को पश्चिमी नदियों (सिंधु, चिनाब, झेलम) पर "रन-ऑफ-द-रिवर" (Run-of-the-River) पनबिजली परियोजनाएँ बनाने की अनुमति है। इसका मतलब है कि भारत नदी के प्राकृतिक प्रवाह को महत्वपूर्ण रूप से बदले बिना बिजली उत्पन्न कर सकता है।

शर्तें (Conditions):

भारत को पश्चिमी नदियों पर परियोजनाएं बनाते समय निम्नलिखित शर्तों का पालन करना होगा:

  • परियोजनाओं का डिज़ाइन (design) संधि के प्रावधानों के अनुरूप होना चाहिए।
  • भारत को पाकिस्तान को परियोजनाओं के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होगी।
  • परियोजनाओं से पाकिस्तान के जल उपयोग के अधिकारों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव (adverse effect) नहीं पड़ना चाहिए।
  • भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि परियोजनाओं के कारण पाकिस्तान में बाढ़ या सूखे की स्थिति उत्पन्न न हो।

सिंधु जल संधि से संबंधित मुख्य विवाद क्या रहे हैं? हाल के वर्षों में क्या मुद्दे उठे हैं?🔗

सिंधु जल संधि को आम तौर पर सफल माना जाता है, लेकिन समय-समय पर कुछ विवाद भी उठे हैं:

  • किशनगंगा जलविद्युत परियोजना (Kishanganga Hydroelectric Project): पाकिस्तान ने इस परियोजना पर आपत्ति जताई थी, क्योंकि यह झेलम नदी की एक सहायक नदी किशनगंगा (नीलम) पर स्थित है। पाकिस्तान का तर्क था कि यह परियोजना संधि का उल्लंघन करती है और इससे पाकिस्तान में जल प्रवाह कम होगा। 2013 में, मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) ने भारत के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन कुछ शर्तें भी लगाईं।

  • रातले जलविद्युत परियोजना (Ratle Hydroelectric Project): यह परियोजना चिनाब नदी पर निर्माणाधीन है। पाकिस्तान ने इस परियोजना के डिजाइन पर आपत्ति जताई है, खासकर स्पिलवे गेट्स (spillway gates) पर।

  • अन्य परियोजनाएं: पाकिस्तान ने भारत की कई अन्य छोटी परियोजनाओं पर भी आपत्ति जताई है।

  • जलवायु परिवर्तन: सिंधु बेसिन (Indus basin) जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति संवेदनशील (vulnerable) है। ग्लेशियरों (glaciers) के पिघलने और वर्षा के पैटर्न (pattern of rainfall) में बदलाव से भविष्य में जल उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे संधि के कार्यान्वयन में चुनौतियाँ आ सकती हैं।

  • तकनीकी विवाद: IWT के प्रावधानों की व्याख्या को लेकर दोनों राष्ट्रों के बीच असहमति है। यह असहमति विशेष रूप से भारत द्वारा पश्चिमी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण के संबंध में है। पाकिस्तान को डर है कि ये परियोजनाएँ उसके क्षेत्र में पानी के प्रवाह को कम कर सकती हैं, जबकि भारत का कहना है कि ये परियोजनाएँ संधि के दिशानिर्देशों के भीतर हैं।

  • हाल के वर्षों में भारत का रुख (India's Stance in Recent Years):

    • भारत ने संधि में संशोधन (modification) की मांग की है। भारत का कहना है कि संधि 1960 की परिस्थितियों पर आधारित है, और अब जनसंख्या वृद्धि और आर्थिक विकास के कारण जल की मांग बढ़ गई है।
    • जनवरी 2023 में, भारत ने संधि में संशोधन की मांग करते हुए पाकिस्तान को एक नोटिस जारी किया। भारत का तर्क है कि पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं पर विवाद को हल करने में सहयोग नहीं कर रहा है।
  • भारत, पाकिस्तान के साथ जल संधि को पूरी तरह से लागू करने का समर्थक रहा है, लेकिन पाकिस्तान की कार्रवाइयों ने भारत को जरूरी नोटिस जारी करने के लिए मजबूर कर दिया है.

    • भारत ने ये भी कहा है की, सिंधु जल संधि के अनुच्छेद IX का अल्लंघन पाकिस्तान की ओर से की गई एकतरफा कार्रवाई है।

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सिंधु जल संधि में विश्व बैंक की क्या भूमिका है?🔗

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) में विश्व बैंक (World Bank) की भूमिका एक मध्यस्थ (mediator) और सुविधाप्रदाता (facilitator) की है, न कि एक गारंटर (guarantor) की। विश्व बैंक की भूमिका निम्नलिखित तक सीमित है:

  1. मध्यस्थता (Mediation): विश्व बैंक ने 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच संधि पर बातचीत करने और हस्ताक्षर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  2. तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति (Appointment of Neutral Expert): यदि दोनों देश किसी विवाद को स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission) के माध्यम से हल करने में विफल रहते हैं, तो विश्व बैंक एक तटस्थ विशेषज्ञ (Neutral Expert) नियुक्त कर सकता है।
  3. मध्यस्थता न्यायालय के लिए अध्यक्ष की नियुक्ति (Appointment of Chairman for Court of Arbitration): यदि तटस्थ विशेषज्ञ भी विवाद को हल नहीं कर पाता है, तो विश्व बैंक मध्यस्थता न्यायालय (Court of Arbitration) के लिए अध्यक्ष की नियुक्ति कर सकता है।
  4. वित्तीय सहायता (Financial Assistance): विश्व बैंक ने संधि के तहत कुछ परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता भी प्रदान की थी।

विश्व बैंक संधि के कार्यान्वयन की निगरानी नहीं करता है और न ही वह संधि के उल्लंघन के मामले में कोई कार्रवाई कर सकता है।


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